Wednesday, January 14, 2026
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युद्ध की स्थिति में 2020 की भारतीय सेना चीन की सेना पर भारी-विदेशी अध्यनो में दावा.चीनी सेना सिर्फ चीनी अखबारों में मजबुत.


 कोरोना काल ने पुरे संसार में आपात काल की स्थिति पैदा कर रखी है,और इस आपातकाल के लिए ज्यादातर देश चीन को जिम्मेदार मान उस पर तरह तरह के आरोप लगा रहे है.इस आपातकाल में  अमेरिका और चीन के बीच चल रहे आर्थिक युद्ध में भी तेजी देखने को मिली है।अमेरिका द्वारा आर्थिक मोर्चे पर हो रहे लगातार हमलो से चीन बौखला गया है. 
इस आपातकाल में अमेरिका,जापान,आस्ट्रेलिया और अन्य यूरोपीय देशो के बन रहे मोर्चे और उन सबकी भारत के साथ बढ़ती नजदीकीया चीन को रास नहीं आ रही,इसलिए वो भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए लद्दाख क्षेत्र में सीमा पर अस्थिरता का माहौल बना रहा है.

भारत की सीमाओं को ज्यादा सुरक्षित करने के उदेश्य से लद्दाख क्षेत्र मे अपना बुनियादी ढांचा मजबूत करना मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में रहा है,
इस पर युद्ध स्तर पर वहां कार्य भी चल रहा है,आज उस सीमा क्षेत्र में भारत ने हवाई पट्टी का निर्माण व अन्य महत्वपूर्ण सड़को का निर्माण लगभग पूरा कर लिया है,बाकी का निर्माण कार्य जारी है,जिन्हे चीन पचा नहीं पा रहा है,और वो इस निर्माण में बांधा डालने के लिए ओछी हरकतों पर उतर आया है.

लद्दाख में भारतीय और चीनी सैनिकों की हुई झड़प के बाद दोनों देशों में तनाव चरम पर है। सीमा पर गतिरोध को लेकर जारी सैन्य और कूटनीतिक बैठको का दौर जारी है,लेकिन अभी तक गतिरोध कायम है.बढ़ते तनाव को देखते हुए दोनों देशों की सेनाओं ने एलएसी के इलाके में अपनी उपस्थिति को और मजबूत कर दिया है। 
चीन अक्सर भारत को गीदड़ भभकी देता है की उसकी सैन्य ताकत भारत से ज्यादा है और इसके अलावा 1962 को याद करने की बात भी करता है . 

1962 में हिमालयी क्षेत्र में जब धोखे से चीन ने भारत पर आक्रमण किया था तब भारतीय सेना इस ऊंचाई वाले इलाके में युद्ध लड़ने के लिए तैयार नहीं थी। भारतीय सेना के पास ऊंचाई पर  लड़ने और ठंड से बचने का साजो सामान भी नहीं था। एक महीने तक चले मुकाबले में चीनी सेना ने अक्साई चिन पर कब्जा कर युद्धविराम की घोषणा कर दी थी। चीन ने दावा किया कि इस युद्ध में उसके 700 सैनिक मारे गए, जबकि भारतीय सेना के हजार से ज्यादा सैनिक शहीद हुए।


आज स्थिति 1962 के बिल्कुल  विपरीत है-


कई अध्ययनो ने इस बात को स्वीकार किया है कीआज स्थिति 1962 के बिल्कुल विपरीत है .
 बोस्टन में हार्वर्ड केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट में बेलफर सेंटर और वाशिंगटन में एक नई अमेरिकी सुरक्षा केंद्र के हालिया अध्ययन में कहा है कि भारतीय सेना उच्च ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ाई के मामले में माहिर है। चीनी सेना इसके आसपास भी नहीं दिखती है।

दोनों देश आज के समय में जल,थल और नभ से परमाणु हमला करने की ताकत रखते हैं,चीन 1964 से तो भारत1974से परमाणु शक्ति संपन्न देश है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के 2020 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, चीन के पास लगभग 320 परमाणु बम हैं और भारत के पास 150 से अधिक हैं। लेकिन अगर युद्ध होता है तो परमाणु  बम के इस्तेमाल की बहुत कम संभावना है क्योकी दोनों देश दोनों एक “नो फर्स्ट यूज” पॉलिसी की बात करते हैं।और परमाणु बम केमामले में दोनों देश लगभग बराबर की स्थिति में हैं।

बेलफर सेंटर के मार्च में प्रकाशित एक अध्यन के अनुसार भारतीय वायुसेना के मिराज 2000 और सुखोई एसयू 30 लड़ाकू विमान ,चीन के जे-10, जे-11और एसयू-27 लड़ाकू विमानों से ज्यादा शक्तिशाली है। चीन ने भारत से लगी सीमा पर इन्हीं विमानों को तैनात किया है। भारतीय मिराज 2000 और एसयू -30 जेट्स ऑल-वेदर, मल्टी-रोल विमान हैं जबकि चीन का जे-10 ही ऐसी योग्यता रखता है,भारत ने पिछले कुछ दशकों में चीन से लगी सीमा पर कई हवाई पट्टियों का निर्माण किया है जहां से ये फाइटर जेट आसानी से उड़ान भर सकते हैं .

  रिपोर्ट के अनुसार तिब्बत और शिनजियांग में चीनी हवाई ठिकानों की अधिक ऊंचाई, क्षेत्र में आम तौर पर कठिन भौगोलिक और मौसम की स्थिति के कारण चीनी लड़ाकू विमान अपने आधे पेलोड और ईंधन के साथ ही उड़ान भर सकते हैं। जबकि,भारतीय लड़ाकू विमान पूरी क्षमता के साथ हमला कर सकते हैं। चीन के एरियल रिफ्यूलिंग कैपसिटी मतलब हवा में ईंधन भरने की क्षमता भी कम है। उसके पास पर्याप्त संख्या में एरियल टैंकर नहीं हैं।
 बेलफर का अध्यन  बताता  है कि चीन ने अपने पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों को अमेरिका के कथित खतरे से बचाने के लिए मजबूत किया है। इस कारण पश्चिमी क्षेत्र में उसके चार एयरफील्ड कमजोर हुए हैं।

 एक अन्य अध्यन के अनुसार  चीनी सेना की संख्या भ्रामक भी हो सकती है। चीन अपनी सेना की जो संख्या बताता है उसमें भी बड़ी गड़बड़ी है।



वीसीएनएएस की रिपोर्ट-
 अनुसार भारतीय सेना के पास युद्ध का बड़ा अनुभव है जो विश्व में शायद ही किसी और देश के पास हो भारत की थल सेना हर परिस्थिति में चीनी सेना से बेहतर और अनुभवी है।वर्तमान में भी भारतीय सेना कश्मीर में आतंकवाद और पाकिस्तान से लड़ाई लड़ रही है।
 भारतीय सेना को सीमित और कम तीव्रता वाले संघर्षों में महारत हासिल है.
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 जबकि चीन की पीएलए ने 1979 में वियतनाम के साथ अपने संघर्ष (जिसमे हार देख चीनी सेना भाग खड़ी हुई थी)के बाद से युद्ध का अनुभव नहीं है,
कंबोडिया में वियतनाम के सैन्य हस्तक्षेप के जवाब में चीन ने 1979 में वियतनाम से महीने भर युद्ध किया था। माना जाता है कि अपनी हार को नजदीक देख चीनी सेना भाग खड़ी हुई थी। 
अमेरिकी सेना से युद्ध लड़ने के कारण अधिक अनुभवी वियतनामी सैनिक चीनी सैनिको पर भारी पड़े इस युद्ध में चीन को काफी नुक्सान उठाना पड़ा था.

पब्लिक रिपब्लिकन आर्मी में शामिल सैन्य इकाइयां शिनजियांग या तिब्बत में विद्रोह को दबाने या रूस के साथ चीन की सीमा पर किसी भी संभावित संघर्ष से निपटने के लिए सौंपी गई हैं। और यहां से भारतीय सीमा पर फौज को लेकर जाना चीन के लिए संभव नहीं है क्योंकि भारतीय वायुसेना चीन की रेललाइनों को निशाना बना सकती है। वहीं,भारतीय सेना पहले से ही इन इलाकों में बड़ी संख्या में मौजूद है।


हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हालिया अध्ययन में कहा गया है कि 1962 की तुलना में भारत को चीन के खिलाफ पारंपरिक लाभ है,चीन के मुकाबले में भारत की रक्षा स्थिति ज्यादा मजबूत है.

हार्वर्ड केनेडी स्कूल के बेलफर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स द्वारा प्रकाशित शोध पत्र में भारतीय और चीनी रणनीतिक क्षमताओं के तुलनात्मक आंकड़ों का विश्लेषण व दोनों देशों की परमाणु क्षमताओं, थल और वायु सेनाओं को ध्यान में रखा गया है। जिनका उपयोग वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर किया जा सकता है।


अनुमान है की 104 चीनी मिसाइलें भारत के सभी या कुछ हिस्सों पर हमला कर सकती हैं। इनमें लगभग एक दर्जन डीएफ -31 ए और छह से बारह डीएफ -31 मिसाइलें शामिल हैं जो भारतीय भूमि के सभी प्रमुख लक्ष्यों तक पहुंचने में सक्षम हैं। एक दर्जन और डीएफ-21 मिसाइलों से दिल्ली को खतरा है।
 वहीं चीन ने समय के साथ अधिक सड़क-मोबाइल मिसाइलों को तैनात किया है, इसलिए चीन के अंदर से भारत की सीमा के भीतर मिसाइलों को स्थानांतरित करना उसके लिए और आसान होगा। 
भारत ने अपने परमाणु हथियारों को बमवर्षक विमानों और भूमि आधारित मिसाइलों के जरिए तैयार रखा है। जगुआर आइएस के दो स्कवाड्रन और मिराज 2000 एच लड़ाकू विमानों के एक स्कवाड्रन के कुल 51 विमान परमाणु हमले के लिए तैयार हैं। परमाणु हथियारों से लैस इन विमानों के तिब्बत तक पहुंचने की सबसे अधिक संभावना है। 

   चीन से मुकाबले के लिए भारत की थल सेना उत्तरी, मध्य और पूर्वी कमांड में, जबकि एयर फोर्स पश्चिम, मध्य और पूर्वी वायु कमांड में संगठित है। अनुमान है कि चीन से लगती सीमा के पास भारतीय सेना के हमलावर बल की संख्या करीब सवा दो लाख है इनमें से लद्दाख में 3 हजार कर्मी टी-72 टैंक ब्रिगेड और करीब एक हजार कर्मी अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मोस मिसाइल रेजीमेंट में हैं। वहीं इंडियन एयरफोर्स के 270 लड़ाकू विमान और 68 अटैक एयरक्राफ्ट चीन से लगती सीमा पर मौजूद हैं। भारतीय सेना और एयरफोर्स चीनी सीमा के करीब हैं, इस कारण बहुत कम समय में सेना कारगर कदम उठा सकती हैं। 

 भारत 1962 में धोखा खाया हुआ देश है,उस धोखे से सबक ले भारत ने अपने आप को बहुत मजबूत किया है आज भारत की सेना का मुकाबला कोई अन्य देश की सेना नहीं कर सकती है ,बस  जरूरत है तो सेना के आधुनिकी करण की  जिस पर सरकार बहुत गंभीरता से काम कर रही है.भारत हथियारों के मामले में चीन से पिछड़ा हो सकता है,लेकिन चीनी सेना वियतनाम जैसे छोटे से देश से हारी भी हुई है,भारतीय सेना का मनोबल इन हथियारों से ज्यादा असरकारक है,युद्घ रणनीति में माहिर भारतीय सेना के सामने इन हथियारों का महत्व बहुत कम है.


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